सेहत समाचार
वैसे तो इस बात का अनुमान पहले से ही था कि बचपन के अनुभव वयस्क अवस्था में भी अपना असर दिखाते हैं, मगर यह कैसे होता है, इस मामले में कोई स्पष्ट समझ नहीं थी। एक परिकल्पना यह रही है कि पर्यावरण का असर जीनोम की भौतिक संरचना पर पड़ता है और यह असर दूरगामी परिणाम पैदा करता है। अब जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ साइकिएट्री के क्रिस मुर्गाट्रॉयड और उनके सहयोगियों ने कुछ प्रयोगों के जरिए इसकी क्रियाविधि पर प्रकाश डाला है।
देखा गया कि बचपन में जिन चूहों को तनाव में रखा गया था, उनमें 6 सप्ताह की उम्र से लेकर 1 वर्ष तक ठीक वैसे व्यवहारगत परिवर्तन हुए जैसी कि अपेक्षा थी। इसके अलावा हार्मोन में भी अपेक्षित परिवर्तन देखे गए। विश्लेषण करने पर पता चला कि इन चूहों के मस्तिष्क में आर्जीनीन वैसोप्रेसिन का मिथाइलेशन बहुत कम हुआ था।
इस अनुसंधान ने तनाव की वजह से होने वाले व्यवहारगत परिवर्तनों की आणविक प्रक्रिया को उजागर किया है। इससे लगता है कि इस तरह के परिवर्तनों को संभालने के लिए उपचार जितनी जल्दी शुरू हो जाए, उतना अच्छा। एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि जो परिवर्तन मिथाइलेशन की वजह होते हैं वे स्थायी होते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में शायद उपचार के लिए आर्जीनीन वैसोप्रेसिन के स्तर को अन्य ढंग से नियंत्रित करना ही कारगर होगा।
सौजन्य से - (स्रोत
No comments:
Post a Comment